कॉपीराइट © 2014. नव नालंदा महाविहार, नालंदा, बिहार, भारत. सभी अधिकार सुरक्षित.
नालंदाः एक अवलोकन
नालंदा एक प्राचीन शिक्षापीठ एवं धार्मिक केन्द्र रहा है जिसने ज्ञान का व्यापक प्रचार-प्रसार किया है। यह 5वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच प्राचीन मगध (संप्रति, बिहार, बंगाल का कुछ भाग, उड़ीसा) में अवस्थित था। ऐसा माना जाता है कि ‘नालंदा’ शब्द की उत्पत्ति नालम (कमल) और ‘दा’ से हुई - नालंदा जिसका तात्पर्य ‘ज्ञान देने वाले’ से है। प्राचीन नालंदा महाविहार की स्थापना गुप्तवंश के शासक शक्रादित्य का शासन-काल में हुई।
पाँचवीं और छठी शताब्दी में बुद्ध और महावीर दोनों नालंदा पधारे। यह बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायी सारिपुत्र के जन्म और निर्वाण का स्थान भी था। शून्यता का सिद्धांत देनेवाले नागार्जुन, श्वेनत्सांग के शिक्षक धर्मपाल, चंद्रकीर्ति, शीलभद्र, तर्कशास्त्री धर्मकीर्ति, बुद्धिस्ट लाॅजिक के संस्थापक दिड़नाद, जिन मित्र शांतरक्षित, पदमसंभव आदि अनेक प्रसिद्ध आचार्यों ने नालंदा में अपना अध्ययन एवं अध्यापन किया।
नालंदा दुनिया के आवासीय विश्वविद्यालयों में से सबसे पहला विश्वविद्यालय था। इस परिसर में 10,000 छात्र एवं 2,000 शिक्षक रहते थे। लाल ईटों से बना यह महाविहार स्थापत्य कला का नमूना है। इसमें आठ अलग-अलग अहाते और दस मंदिर थे। इसके साथ ही अनेकों ध्यान-कक्ष एंव कक्षाएँ थीं। पुस्तकालय नौतल्ले भवन में स्थित था जिसमें महत्वपूर्ण ग्रंथों को रखा गया था। यहाँ प्रख्यात आचार्यों द्वारा प्रत्येक विषय की शिक्षा दी जाती थी और दुनिया के सभी भागों-कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, पर्शिया और टर्की- के छात्रों और अध्येताओं को इसने आकर्षित किया था। 1193 ई॰ में मामलुक वंश के एक मुस्लिम इख्तियार-अद-दिनमुहम्मदविन वख्तियार खिलजी ने अपनी सेना के माध्यम से इसे तहस-नहस कर दिया। फिलहाल, प्राचीन नालंदा महाविहार का अवशेष 14 एकड़ में फैला हुआ है और इसका अधिकांश भाग अभी भी उत्खनित किया जाना है। नालंदा, राजगीर एवं बोधगया के ऐतिहासिक महत्त्व के कारण प्रत्येक वर्ष भारत और विदेशों से हजारों पर्यटक आकर्षित होकर आते है।

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नव नालन्दा महाविहार
(मानित विश्वविद्यालय)
संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार
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